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लघुकथा की सृजन-प्रक्रिया का स्वरूप
      भगीरथ 

नीति एवं बोध कथाएँ जीवन के उत्कट अनुभव को सीधे-सीधे व्यक्त करने की बजाय उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न विचार को रूपक कथाओं के माध्यम से व्यक्त करती हैं। (जबकि) समकालीन लघुकथाएँ अधिकांशतः अनुभव के बाह्य विस्तार में न जाकर अनुभवात्मक संवेदनाओं की पैनी अभिव्यक्ति करती हैं। अतः इन दो प्रकार की रचनाओं की सृजन-प्रक्रिया भी अलग-अलग है। स्थिति, मनःस्थिति, वार्तालाप, व्यंग्य, मूड, पात्र आदि संबंधी वे अनुभव जो लघु कलेवर एवं कथारूप में व्यक्त हो सकने की संभावना रखते हैं, साथ ही, रचना की संपूर्णता का आभास देते हों, उन्हें लघुकथाकार अपनी सृजनशील कल्पना, विचारधारा, अन्तर्दृष्टि एवं जीवनानुभव की व्यापकता से लघुकथा में अभिव्यक्ति देता है। जो लघुकथाएँ विचार के स्तर पर रूपायित होती हैं, उनके लिए कथाकार घटना, कथानक, रूपक या फेंटेसी की खोज करता है। प्रस्तुत खोज में अनुभव की व्यापकता के साथ ही सृजनशील कल्पना की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह खोज विधागत सीमाओं के भीतर ही होती है। जब रचना एक तरह से मस्तिष्क में मेच्योर हो जाती है और संवेदनाओं के आवेग जब कथाकार के मानस को झकझोरने लगते हैं, तब रचना के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इस प्रक्रिया के दौरान रचना परिवर्तित होती है। भाषा-शिल्प पर बार-बार मेहनत से भी रचना में बदलाव आता है। यह बदलाव निरंतर रचना के रूप को निखारता है। यह भी संभव है कि मूल कथा ही परिवर्तित हो जाये। लघुकथा संयमी विधा है। इसके लिए कथाकार को अनावश्यक छपे शब्दों का मोह छोड.ना पड.ता है। लघुता एवं अभिव्यक्ति के पैनेपन को प्राप्त करने के लिए शब्द, प्रतीक, बिंब, लोकोक्ति एवं मुहावरों ज्युडीशियस सलेक्शन(Judicious Selection) करता है और उसे कोहरेन्ट(Coherent) रूप में प्रस्तुत करता है। लघुकथा में कहीं बिखराव का एहसास होते ही लघुकथाकार एक बार फिर कलम उठाता है। अक्सर लघुकथा को आरम्भ करने में काफी कठिनाई होती है। आरंभ बार-बार बदल सकता है क्योंकि कुछ ही वाक्यों में लघुकथा को एक तनावपूर्ण चरमस्थिति तक पहुँचाना होता है। चरमस्थिति पर रचना का फैलाव होता है और वहीं अप्रत्याशित ही, रचना एक झटके से अन्त तक पहुँच जाती है। इससे रचनाकार कथा को प्रभावशाली और संप्रेषणीय बना देता है। अनेक लघुकथाओं में अन्त अधिक चिन्तन और मेहनत माँगता है, क्योंकि पूरी रचना का अर्थ अन्त में ही स्पष्ट होता है। ऐसा प्रमुखतः धारदार व्यंग्य(हास्य-व्यंग्य नहीं) एवं वार्तालाप शैली में लिखी गई लघुकथाओं में होता है। संवादों को छोटा, चुस्त, स्पष्ट एवं पैना करने में कथाकार की सृजनशक्ति और मानसिक श्रम विशेष महत्व रखते हैं।

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